वक़्त की इन पथरीली राहों पर , चलते हम बिन पँख परिंदे से...
मन की अपनी हर मुराद को , ढकते हम दुनिया दारी के पर्दों से...
बचपन की हर गलती भली , समझदारी की इन हरकतों से .
दोस्तों के संग का वो दौर भला , नादानी की झड़पों में खुशियाँ थी भरी...
कहाँ गयी वो सारी बातें , करती थी जो खुशियाँ शामिल...
कुछ पाने की इस उलझन में , भूल गये हम हँसाने को ...
जीने की परिभाषा को , तौला हमने दौलत के पलड़ों पर ...
दोस्तों की सच्चाई को , परखा हमने मतलब के चस्मो से ...
माँ के आँचल की छाँव से , कहाँ आज हम पहुँच गये ???
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