Sunday, 15 April 2012

कहाँ आज हम पहुँच गये??

वक़्त  की  इन पथरीली  राहों  पर , चलते  हम  बिन  पँख परिंदे  से...
मन  की  अपनी  हर  मुराद  को , ढकते हम  दुनिया दारी के  पर्दों  से...

बचपन  की  हर  गलती  भली , समझदारी  की इन  हरकतों  से .
दोस्तों  के  संग  का  वो  दौर  भला , नादानी  की  झड़पों  में  खुशियाँ थी भरी...

कहाँ  गयी  वो  सारी बातें , करती  थी  जो  खुशियाँ  शामिल...
कुछ  पाने  की  इस  उलझन  में , भूल  गये  हम  हँसाने  को ...

जीने  की परिभाषा को , तौला हमने  दौलत  के  पलड़ों  पर ...
दोस्तों  की  सच्चाई  को , परखा  हमने  मतलब  के  चस्मो  से ...

माँ  के  आँचल की  छाँव से  , कहाँ  आज  हम  पहुँच  गये ???


@मेरीतस्वीरकेरंग

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